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महाराणा
प्रताप कि हिंदी कविता | Maharana Pratap Poem
in Hindi
महाराणा
प्रताप अपने समय के वीर राजाओं मे से एक थे। इतिहास में उन्हे अपनी वीरता और साहस
के लिये जाना जाता है। उन्होने हमेशा मेवाड़ के सम्मान कि रक्षा की है इसलिये उन
पर कई कवियों ने कविताऍं लिखी है जिनमें से कुछ मैं यहॉं पर प्रस्तुत कर रहा हूँ –
श्याम
नारारण पाण्डेय द्वारा रचित कविता
महाराणा कि तलवार
चढ़ चेतक पर तलवार उठा
रखता
था भूतल पानी को
राणा प्रताप सिर काट-काट
करता था सफल जवानी को
कल-कल
बहती थी रणगंगा
अरिदल
को डूब नहाने को
तलवार वीर की नाव बनी
वैरी
दल को ललकार गिरी
वह
नागिन सी फुफकार गिरी
था शोर मौत से बचो बचो
तलवार गिरी तलवार गिरी
पैदल
हयदल गजदल मे
छप-छप
करती वह निकल गयी
क्षण कहॉं गई कुछ पता न फिर
देखो चम-चम वह निकल गयी
क्षण
इधर गई क्षण उधर गई
क्षण
चढ़ी बाढ़ सी उतर गई
था प्रलय चमकती जिधर गई
क्षण शोर हो गया किधर गई
लहराती
थी सिर काट-काट
बलखाती
थी भू पाट-पाट
बिखराती अवयव बॉंट-बॉंट
तनती थी लहू चाट-चाट
क्षण
भीषण हल-चल मचा दिया
राणा
कर की तलवार बढ़ी
था शोर रक्त पिने को यह
रण चण्डी जीभ प्रसार बढ़ी
कवि कुलदीप महाबली द्वारा रचित कुछ पंक्तियाँ -
सूचनाऍं
मिली की युद्ध के लिए तैयार हो जाओ
रणभेरिया
बजवा दो –
योजनाऍं
बनने लगी कि कैसे लड़ेंगे।
मात्र
हजार लाखों से हम कैसे भिड़ेंगे
किंतु साहसी सिपाही पिछे ना हटे
कहा सभी लड़ेंगे चाहे कर्दन कटे
योद्धा
वही जो युद्ध अंत तक हे लड़े
योद्धा
वही जो प्राण हाथों मे लिये खड़े
योद्धा
वही जो वीर का आयाम गड़ सके
योद्धा वही जो बेरियो की छाती चढ़
सके
ये
रण का वीर योद्धा रण लाशों से पाटेगा
एक
राजपूत दस मुगलों को काटेगा
योजनाऍं बनती है तो सभा बुलाई महाराणा ने और बोले सारे वीरों से –
तलवारों
से धार लिये वो बोले उन रणधीरों से
बोले
वीरों समय निकट है शिश धरा को अर्पण का
बोले वीरों समय निकट है तन-मन
सर्वस्व समर्पण का
जन्मभूमि से बढ़कर है दुनिया में
कोई महान नहीं
जो
जान देशहित के काम ना आए
वो
जान कोई वो जान नहीं
रण मे कुम्भा सांगा जैसे करतब
तुमको दिखलाने है
शशक्त राष्ट्र की नींव रखें ऐसे
करतब आजमाने है
विजय
अजय का शोर मचा दो शत्रु जो घबरा जाये
निश्चित
ऐसा करना होगा जो अपना परचम लहराये
तुमसे बचकर वो भाग उठे ऐसा हो कोई
द्वार नहीं
हों जिसमें तीखी धार नहीं उसको
मानों तलवार नहीं
हल्दीघाटी व राणा का संवाद
रंग
पिला है रक्त पड़ा जब लाल हुई माटी का
घाटी
बोली होगी रण मे मे प्रत्यक्ष रण मे रहूँगी
तेरे तैवर इतिहासों मे मै
चिख-चिख कर कहूँगी
तू वक्स तान के खड़ा रहे बस
इतना मेरा निवेदन
भाले
को तैयार करो तुम शत्रु का ही अभेदन
तो
नमन किया राणा ने हल्दीघाटी को रूक कर के
तो नमन किया राणा ने हल्दीघाटी
को झुक कर के
मेरी मिट्टी तुमको नमन आज करता हूँ
तू
मिट्टी स्वाभिमानी तेरे चरण शिश धरता हूँ
तेरी
गाथा आगे चल सोते को यहॉं जगाएगी
तेरी मिट्टी का दुनिया माथे से
तिलक लगाएगी
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