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शहीद-ए-आजम भगतसिंह का सम्‍पूर्ण जीवन परिचय

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 शहीद-ए-आजम भगतसिंह का सम्‍पूर्ण जीवन परिचय



पंजाब की पृष्‍ठभूमि

पंजाब जो पॉंच नदियों के प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है। यहॉं कि उपजाऊ भूमि विभिन्‍न प्रकार के अन्‍नौ को पैदा कर भारतवर्ष का भरण-पोषण करती है, इसलिये भी इसे जाना जाता है, परन्‍तु पंजाब का महत्‍व केवल इन्‍हीं चीजों के कारण सीमित नहीं है। इसके महत्‍व में उन वीरों के बलिदानों का भी महत्‍वपूर्ण योगदान है, जिन्‍होनें इस धरती पर जन्‍म लेकर स्‍वयं को धरती मॉं की आजादी के लिये समर्पित कर दिया।।यहॉं के बच्‍चों को वीरता और साहस का गुण विरासत में दिया जाता है।

इस धरती पर जितने भी क्रांतिकारी पैदा हुये उनमें न तो जीने की चाहत थी और न ही मरने का भय।उनका केवल एक ही उद्देश्‍य था कि धरती मॉं को आजाद करवाना है । उनके मुख में हमेशा यही शब्‍द रहते थे-

“सिर पर बॉंधे कफन, हाथों मे मौत का परवाना है।

जिन्‍दा रहना लक्ष्‍य नहीं , मॉं को आजाद करवाना है।।“

भगतसिंह जन्‍म एवं नामकरण

27 सितंबर सन् 1907,दिन शनिवार को पंजाब के लायलपुर जिले के “बंगा” नामक गॉंव में “शहीद-ए-हाजम” भगतसिंह का जन्‍म हुआ था।

कहते है, कि किसी पुण्‍यआत्‍मा के आगमन से अशुभता भी धीरे-धीरे शुभता में परिवर्तित हो जाती है। ऐसा ही किशनसिंह के यहॉं भी हुआ। भगतसिंह के जन्‍म के तीसरे दिन ही उनके पिता किशनसिंह और चाचा स्‍वर्णसिंह को कारावास से से रिहा कर दिया गया।।अभी तो केवल उन्‍होनें घर मे प्रवेश ही किया था कि उनके एक अन्‍य चाचा अजींतसिह का भी रिहाई का समाचार आ पहुँचा। यह सभी परिवार वालों के लिये एक बहुत ही खुशी का अवसर था।यह सब देख उनकी दादी जयकौर कहती है, मेरा पुत्र कितना भागावाला है, जिसके आते ही सारा परिवार पुन: मिल गया, पिछले जनम मे यह जरूर  कोई भगत रहा होगा। इसी का समर्थन करते हुये उनके पिता किशनसिंह ने उनका नाम भगतसिंह रख दिया। इस प्रकार अनजाने मे ही भगतसिंह का नाम रख दिया गया, परन्‍तु आनें वाले वर्षो मे यह नाम अमिट हो जाने वाला था, इतिहास के पन्‍नो मे जिसे स्‍वर्ण अक्षरों मे सजाया गया और जो स्‍वतंत्रता की मिसाल बन गया।

प्रारंभिक शिक्षा

भगतसिंह के अतिरिक्‍त सरदार किशनसिंह की आठ संताने और भी थी,जिनमें जगतसिंह, कुल‍वीर सिंह, कुलतारसिंह, राजेन्‍द्रसिंह , रणवीर सिंह नामक पॉंच पुत्र और बीबी अमर कौर, बीबी प्रकाश कौर, बीबी शकुंतला कौर नामक तीन पुत्रियॉं भी थी। इनमें केवल जगतसिंह ही भगतसिंह से बड़े थे।

सदियों से ऐसा कहा जाता है, कि बच्‍चों के लिये उनका घर ही उनका प्राथमिक विद्यालय और उनके माता-पिता ही उनके प्रथम अध्‍यापक होते है और भगतसिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन पर उनके दादा और पिता तथा चाचा के विचारों और वीरता का गहरा प्रभाव था। उन्‍हें माता से अनुशासन और शिष्‍टाचार का गुण भी सिखने को मिला ।

विद्यालय में प्रवेश

भगतसिंह जब कुछ बड़े हुये तो उनके पिता किशनसिंह ने उनका दाखिला गॉंव के एक प्रायमरी स्‍कूल में करवा दिया। उनका बड़ा भाई जगतसिंह भी इसी स्‍कूल में पड़ता था। भगतसिंह अधिकांश स्‍कूल की छुट्टी होने पर घने जंगल में टहलने निकल जाते थे। उन्‍हें खेलने-कूदने में ज्‍यादा रूचि न थी। वे बचपन से ही स्‍वतंत्रता के माहौल को पसंद करते थे। इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है, कि वह पढ़ाई से जी चुराने थे, बल्कि वह तो स्‍कूल के सभी बच्‍चों में सबसे बुद्धिमान थे, परन्‍तु उन्‍हें खुले वातावरण मे रहना बचपन से बेहद पसंद था।

जगतसिंह की मृत्‍यु

भगतसिंह और जगतसिंह में अगाध स्‍नेह था। चूँकि जगतसिंह आयु में बड़े होने के कारण भगतसिंह का पूरा ख्‍याल रखते थे। परन्‍तु एक दिन जगतसिंह के स्‍कूल से लौटते ही उसे तेज बुखार था। वैद्य को बुलाकर इलाज करवाने पर भी उस पर कोई असर नहीं हुआ और दिन-प्रतिदिन स्थिति बिगड़ती गयी । अंतत: ग्‍यारह वर्ष की आयु में उसका निधन हो गया। इसका भगतसिंह पर बहुत ही बुरा असर पड़ा, क्‍योंकि भगतसिंह उनसे बहुत ही अधिक स्‍नेह करते थे, इसलिये उनकी मृत्‍यु से वह उदास-उदास से रहने लगे। यह देख उनके माता-पिता को चिंता सताने लगी कि कहीं वह अपने बड़े पुत्र की तरह छोटे पुत्र भगतसिंह को भी न खो दे।

नवाकोट में निवास

चूँकि भगतसिंह को जगतसिंह से अति स्‍नेह होने के कारण उसकी मृत्‍यु के पश्‍चात वह बहुत ही उदास रहने लगे वे न तो खाने में रूचि लेते और न ही खेलने मे। वह अकेला ही खेत में एक वृक्ष के नीचे अधिकांश बैठे रहते और कुछ सोचा करते। यह सब देख माता विद्यावती को चिंता होने लगी और उन्‍होने यह बात उनके पिता किशनसिंह को बताई। किंशनसिंह ने चिंतन-मनन कर यह निर्णय लिया कि चूँकि जगतसिंह की याद पूरे घर में बसी हुई है और इस दुख से बाहर निकालने के लिये हमें भगतसिंह को यहॉं से कहीं दूर ले जाना चाहिए और उन्‍होने नवाकोटा जाने का निर्णय लिया। इस प्रकार वह नवाकोटा में प्रस्‍थान कर गये।

 

डी.ए़ वी. मे दाखिला

भगतसिंह को प्राथमिक शिक्षा गॉंव में ही पूरी हुई। तत्‍पश्‍चात किशनसिंह ने भगतसिंह का दाखिला हाईस्‍कूल में करवाने का सोचा। उस समय नवाकोटा में एक खालसा स्‍कूल हुआ करता था। परन्‍तु उस स्‍कूल का संचालन तो सिक्‍ख करते थे, पर उस पर अंग्रेजी हुकूमत का प्रभाव भी बहुत ज्‍यादा था और एक देशभक्‍त के लिये इस स्‍कूल मे दाखिला करवाना किसी अपमान से कम नहीं है। इसलिये किशनसिंह ने किसी की भी बात पर ध्‍यान न देते हुये भगतसिंह का दाखिला “दयानंद एंग्‍लों वैदिक स्‍कूल” में करवा दिया। वहॉं का राष्‍ट्रीयता का माहौल भगतसिह को बहुत अच्‍छा लगा। वहॉं उन्‍होने अंग्रेजी, उर्दू के साथ-साथ संस्‍कृत का भी गहन अध्‍ययन किया। उन्‍हें अपने गुणों के विकास मे यहॉं पर बहुत मदद मिली। सरल शब्‍दों में कहें तो शहीद-ए-आजम भगतसिंह का जन्‍म वास्‍तविकता मे यही हुआ।

जलियाँवाला बाग हत्‍याकांड

इतिहास मे 13 अप्रैल की तारीख गौरवशाली और अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन दो घटनाऍं हुयी थी। पहली एक बार जब गुरू गोविंदसिंह ने अपने अनुयायियों की परीक्षा लेने के लिये एक सभा का आयोजन किया था। इस सभा मे बहुत से अनुयायी शामिल हुये थे।सभा के दौरान गुरू गोविंदसिंह ने तलवार अपने हाथो मे लेते हुये अपने अनुयायियों से कहॉं मुझे किसी कार्य के लिये पॉंच सिर-कमलों की आवश्‍यकता है,अत: है वीरों उठो और अपने सिर-कमल अर्पित कर दो। प्रारंभ मे तो लोगो को आश्‍चर्य हुआ परंतु उनके द्वारा पुन: कहने पर एक-एक करके पॉंच अनुयायियों ने अपने सिर अर्पित कर दिये और तभी से इस तारीख को “बैसाखी” के रूप मे मनाया जाता है। दूसरा जहॉं एक ओर बैसाखी का पर्व मनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर क्रांतिकारियों ने अमृतसर के स्‍वर्ण मंदिर के पास स्थित जलियॉवाला बाग मे एक सभा का आयोजन किया हुआ था। इस सभा मे हजारो की संख्‍या मे लोग शामिल हुये थे। सभा प्रारंभ हो चुकी थी और भाषण तथा वाद-विवाद चल रहे थे, कि इस सभा कि खबर पंजाब के गर्वनर जनरल को लग गयी और उसने सभा को रोकने के लिये जनरल डायर को 90 सैनिकों के साथ अस्‍त्र–शस्‍त्र सहित जलियॉंवाला बाग मे भेज दिया। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के जनता पर गोलियॉं बरसाना प्रारंभ कर दी, चूँकि जलियॉंवाला बांग का दरवाजा बहुत ही सॅंकरा था , इसलिये कोई भी व्‍यक्ति भाग नहीं पाया और सबका नरसंहार कर दिया गया। चूँकि इस बाग मे एक कुऑं भी था, तो महिलाओं और बच्‍चों ने अपनी जान बचाने के लिये इस कुऍं मे छलॉंग लगा दी ,परंतु यह कुऑं भी काल का मुख सिद्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है , कि आज भी उस कुऍं मे पानी का रंग लाल ही है। यद्यपि अधिकारिक तौर पर इस घटना मे मरने वालों की संख्‍या 379 बताई गयी ,परंतु अमृतसर के तत्‍कालिक सिविल सर्जन डॉ. स्मिथ के अनुसार यह संख्‍या लगभग 1800 से अधिक थी।

इस दिन भगतसिंह स्‍कूल नही गया था। उसे जैसे ही पता चला इस घटना के बारे मे वह जलियॉंवाला बाग मे पैदल ही चला गया, वहॉं पर उसने हजारो वीर क्रांतिकारियों की लाशे देखी और यह घटना देख उसका मुख क्रोध से भर उठा तथा उसके वहॉं की मिट्टी हाथों मे लेकर कसम खायी की मैं इन शहिदों का बदला अवश्‍य लूँगा। इस घटना का भगतसिंह पर बहुत गहर प्रभाव पड़ा था।

चौरीचोरा की घटना क्‍या है?

वर्ष 1920 में महात्‍मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्यान किया। इस आंदोलन मे विदेशी वस्‍तुओं, न्‍यायालयों , विद्यालयों आदि सभी विदेश क्रियाकलापों का बहिष्‍कार किया गया। इस आंदोलन से भगतसिंह बड़े प्रभावित हुये और वह भी अपनी नौवी कक्षा की पढ़ाई छोड़कर इस आंदोलन मे शामिल हो गये। भगतसिंह तथा उनके अन्‍य मित्र इस आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ो को एकत्रित करते और उन्‍हे जला देते । उन्‍होने जो आग जलायी थी, वह तीन दिनो तक विदेशी कपड़ो से जलती रही, परंतु अचानक यह आंदोलन स्थिगित कर दिया गया, क्‍योंकि 4 जनवरी 1922 को उत्‍तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद के चौराचोरी गॉंव मे इस आंदोलन का जूलूस बड़े ही शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से निकल रहा था , परंतु जब यह जुलूस वहॉं कि पुलिस चौकी से गुजर रहा था, तो अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिये कुछ अपशब्‍दों का प्रयोग किया। प्रारंभ मे तो क्रांतिकारियों ने कोई ध्‍यान नहीं दिया परंतु ज्‍यादा अपमान करने पर उन्‍होने प्रतिकार स्‍वरूप अंग्रेजो को विपरित जवाब दिया, परंतु अंग्रेज अधिकारी भला अपना अपमान कैसे सह सकते थे, उन्‍होने आदेश पाते ही क्रांतिकारियों पर गोलिया की फायरिंग शुरू कर दी ,जिससे एक क्रांतिकारी वही ढेर हो गया, यह देख क्रांतिकारियों मे आक्रोश पैदा हो गया और उन्‍होने पुलिस पर हमला करना प्रारंभ कर दिया। पुलिस ने अपने सुरक्षा के लिये स्‍वयं को थाने मे बंद कर लिया, परंतु क्रांतिकारियों ने थाने मे आग लगा दी और इस घटना से अनेक सिपाही जल कर राख हो गये। यद्यपि गांधी जी ने यह आंदोलन अहिंसक पद्ध्‍ति से संचालित करने का सोचा था , परंतु इस हिंसक घटना से गॉंधी जी यह विचार पूरी तरह से टूट गया और उन्‍होने यह आंदोलन स्‍थगित कर दिया, परंतु भगतसिंह और उनके मित्र अब अंग्रेजों के दमन के लिये मैदान मे उतर चुके थे और उन्‍होने अपना एक अलग दल बनाने का फैसला किया।

सुखदेव से मित्रता

चूँकि असहयोग आंदोलन के चलते भगतसिंह ने नौवी कक्षा मे ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी ,परंतु भगतसिंह अब आगे की पढ़ाई भी करना चाहते थे। अत: उनके पिता ने उनका दाखिला नेशनल कॉलेज मे करवा दिया था।यही पर भगतसिंह की मुलाकात सुखदेव से हुई थी। चूँकि सुखदेव और भगतसिंह की विचारधारा समान थी, इसलिये उनकी पहली मुलाकात ही मित्रता मे बदल गई और यही से दोनो एक-दूसरे के मित्र बन गये। उनकी यह मित्रता जीवनपर्यंत बनी रही।

पुस्‍तको से लगाव.

भगतसिंह को पुस्‍तके पढ़ने का बड़ा शोक था। वे बचपन से ही पुस्‍तक पढ़ने के आदि थे।उन्‍होने ने बहुत से विदेशी लेखकों की पस्‍तके भी पढ़ रखी थी। उन पर कार्ल मार्क्‍स और बुकनिन के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा।उन्‍होने एक “हिंसा का मनोविज्ञान” नामक पुस्‍तक भी पढ़ी थी और इसी पुस्‍तक से उन्‍हें असेंबली मे बम गिराने का विचार आया। उन्‍होने इस पुस्‍तक को लगभग 64 बार पढ़ा था।

 भगतसिंह ने घर क्‍यों छोड़ा?


.सन् 1923 मे भगतसिंह अपने आगे की पढ़ाई कर रहे थे, कि तभी उनके परिवार वालों ने उनके विवाह करने का सोचा और उनके पिता किशनसिंह ने सरगोध जिले के मानवाला गॉंव मे रहने वाले सरदार तेजासिंह की बहन के साथ भगतसिंह का विवाह तय कर दिया, परंतु तेजासिंह भगतसिंह से एक बार मिलना चाहते थे, जिसे किशनसिंह ने सहर्ष स्‍वीकार कर लिया। कुछ समय पश्‍चात् वह भगतसिंह से मिले और उनसे बातचीत की। भगतसिंह ने उनका बड़ा ही आदर सम्‍मान किया। भगतसिंह के संस्‍कार देखकर तेजासिंह बोल उठे भगतसिंह बहुत ही गुणी व्‍यक्ति है, मेरी बहन इस घर मे खुशी से रहेगी।भगतसिंह ये बात सुनकर स्‍तब्‍ध रह गये, परंतु उन्‍होने कुछ नहीं कहा, वे चुपचाप उन्‍हें तॉंगे पर बैठाकर (तेजासिंह को) छोड़ आये। तत्‍पश्‍चात अपने घर लोटे और अपने पिता से पूरी बात जानने का प्रयाश किया। भगतसिंह को जब यह पता चला कि उनका विवाह तय किया गया है, वह बहुत ही नाराज हो गये और उन्‍होने यह निश्‍चय कर लिया कि अगर मैंने विवाह कर लिया तो मैं कभी भी देश को स्‍वतंत्र नहीं करा पाऊँगा और अगले ही दिन वह एक चिट्टी लिखकर घर से रवाना हो गये। इस प्रकार एक पंछी पिंजरे से बाहर निकल चुका था।

असेंबली मे बम

8 अप्रैल 1930, जिस दिन असेंबली मे “जन सुरक्षा बिल” और “औद्योगिक विवाद बिल” पारित होने वाले थे। इन बिलों के पारित होने का अर्थ बेडि़यों मे जकड़े हुये भारतीयों को एक और बेड़ी मे जकड़ने जैसा था।क्रांतिकारियों के संगठन ने इन बिलों को रोकने के लिये असेंबली मे बम फेंकने का निर्णय लिया। इसके लिये भगतसिंह और बटुकेश्‍वर दत्‍त को चुना गया। दोनों ही असेंबली मे प्रवेश कर अपनी कुर्सियों पर बैठ गये थे। जैसे ही सभा प्रारंभ हुई उन्‍होने इसी दौरान असेंबली मे बम फेंक दिये, जिससे असेंबली मे भगदड़ मच गयी। चारों ओर इंकलाब जिंदाबाद के नारे गुंज रहे थे और ऊपर से परचो की बरसात हो रही थी जिसमें लिखा था बहरों को सुनाने के लिये धमाका जरूरी है। यही पर भगतसिंह और बटुकेश्‍वर दत्‍त को गिरफ्तार कर लिया गया। सांडर्स की हत्‍या के दौरान पुलिस ने राजगुरू को भी बंदी बना लिया था। इस प्रकार तीनों क्रांतिकारीयों को बंदी बना लिया गया।

भगतसिंह कि मृत्‍यु कैसे हुई?

24 मार्च 1931 को लाहौर जेल में प्रात:काल मे भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फॉंसी दी जानी थी, परंतु विभिन्‍न आंदोलनों के दौरान भगतसिंह विभिन्‍न लोगों के आदर्श बन चुके थे, इससे सरकार को यह भय था कि जनता इस दिन आंदोलन छेड़ सकती है, इसलिये उन्‍होने 23 मार्च 1931 को ही प्रात:काल में इन तीनों क्रांतिकारियों भगतसिंह,सुखदेव और राजगुरु को फॉंसी दे दी। इस प्रकार तीन क्रांतिकारियों ने मातृभूमि की आजादी के लिये हॅंसते-हँसते बलिदान दे दिया।


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